April 23, 2021

Ayodhya verdict : फैसले से असंतुष्ट मुसलमान नेताओं से वकील फिरोज अहमद के कुछ अहम सवाल

अयोध्या मामले पर सालों से चले आ रहे गतिरोध को खत्म करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है । नतीजा जो भी है वह सबके सामने है । सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन का मालिकाना हक रामलला विराजमान को दे दिया है ।

इस मामले में गौर करने वाली बात एक और है कि सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान का हक किसी धर्म गुरु को ना देकर, सरकार को दिया है । साथ ही यह भी संदेश दिया है कि सरकार सेक्यूलर है और उसे सभी की आस्था का ख्याल रखना चाहिए ।

सालों से लंबित चले आ रहे मामले पर तीस हजारी कोर्ट के वकील और सामाजिक कार्यकर्ता फिरोज अहमद मुसलमान नेताओं से कुछ सवाल करते हुए कहते हैं कि,

अगर इस मामले में दोनों पक्षों की तरफ से राजनीति करने वाले लोगों को देखा जाए तो दोनों धर्मों के उलेमा, राजनीतिक नेता, उनके दल, महंत, शंकराचार्य, अखाड़े और बाबा या तो बड़े बिज़नेसमैन बन चुके है या बड़े नेता ।

वकील फिरोज अहमद कहते हैं कि जिस जगह पर विवाद है, वहाँ पाँच सौ साल से विवाद है।

अयोध्या में रहने वाले मुसलमानों ने तो वहाँ जाकर एक बार भी नमाज़ पढ़ने की कोशिश नहीं की। फिर बाहरी मुसलमान आजम खान और ओवैसी वहां जाकर नमाज पढ़ेंगे यह बात समझ के परे है ।अयोध्या और फ़ैज़ाबाद वासी मस्जिदों में शांति से नमाज़ पढ़ रहे हैं।

इसलिए फ़ैसला जो भी आये, वहाँ मंदिर बनने देना अक़्लमंदी होगी और आप यक़ीन मानिये कि अगर वहाँ मंदिर बना तो इसके नतीजे पूरे भारत के लिए बेहतर होंगे। इसके बाद यह देश तय कर देगा कि ग़रीबी, बेकारी, भुखमरी, बर्बाद होती खेती के बजाय, वह हिंदुत्व का एजेंडा चलने देगा या नहीं।

मेरी जानकारी के हिसाब से अयोध्या मामले मे मुस्लिम पक्षकारों को अदालत के बाहर ये मामला आपसी सहमति से सुलझाने के लिये बंटवारे के दौरान दिल्ली और हरियाणा की अवैध कब्ज़ा हुई और दशको से बन्द पडी हज़ारो वीरान मस्जिदें राम मंदिर के बदले मुसलमानों को सौंपने का प्रस्ताव दिया गया था? लेकिन कौम के झंडा बरदार उस पर एकमत नहीं हुए ।

अब मेरे कुछ सवाल है उन छोटे बडे कुछ मुसलमान चेहरों से, जो अदालत के फैसले से संतुष्ट नही हैं ।

  • बाबरी मस्जिद और बाकी दुनिया की किसी भी मस्जिद मे अल्लाह और इस्लाम की नज़र मे क्या फर्क था और क्या फर्क है?
  • अगर अदालत का फैसला मस्जिद के पक्ष मे आ भी जाता… तो वहाँ मस्जिद की तामीर के लिए कौन जाने वाला था?
  • अदालत के फैसले के बावजूद अगर देश का बडा हिन्दू वर्ग 1992 मे बाबरी मस्जिद को ढहाने की तर्ज पर ही अदालत के खिलाफ जाकर मंदिर का निर्माण भी कर लेता तो वो लोग क्या कर लेते?
  • और ऐसे हालात बनने पर देश मे क्या माहौल होने वाला था ?

मेरी छोटी अक्ल के हिसाब से सुप्रीम अदालत ने ये फैसला करके तथ्यो की अनदेखी और कुछ लोगों के साथ नाइंसाफी करने का इल्जाम अपने सर लेकर भी दुनिया भर के करोडों लोगों की आस्था का बचाव भी किया ।

हिन्दुस्तान के सभी वर्गों के गरीब मजदूरों के रोजगार और देश के अल्पसंख्यकों की जान माल को हो सकने वाले संभावित नुकसान को भी रोका है, और साथ ही साथ बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम बाहुल्य पडोसी देशों मे रहने वाले हिन्दू अल्पसंख्यकों को सकने वाली दुश्वारियों से भी बचाया है।

अदालत का फैसला सभी को स्विकार्य होना चाहिए । फैसले के खिलाफ अब आगे कोई अपील नही होनी चाहिए बाकी होना तो वही है जिसके होने की “राजनीति” को फिलहाल जरूरत होगी!!

आपको समझना होगा कि कांग्रेस से लेकर सपा, बसपा, भाजपा से लेकर कुछ उलेमाओं और मुस्लिम धार्मिक नेताओं तक ने छल किया है ।

भाजपा, संघ, तमाम हिंदूवादी संगठनों, मीडिया और तटस्थ कॉरपोरेट ग्रुप्स के पास इस मुद्दे पर राजनीति करने का यह आखिरी मौका है । उसके बाद उन्हें मजबूरी में ही सही लेकिन विकास और रोजगार पर बात करनी पड़ेगी

मंदिर बन गया और मुसलमान चुप रहा तो समझिए आपने उन्हें हरा दिया। आपने एक बड़ी लड़ाई जीत ली। आपकी जीत इसी में है कि बिना किसी बाधा के वहां मंदिर बन जाए और आप उफ भी न करें। आपकी एक चुप्पी सारे निजाम पर भारी पड़ेगी।

लेखक-फिरोज अहमद दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट के वकील और सामाजिक कार्यकर्ता हैं ।
यह लेखक के अपने निजी विचार है