देश के युवायों के बीच बापू की बनी धारणा फैंसी फ़ेसबुक या सोशल मीडिया के द्वारा है, बापू को उनके देश ने ही सबसे कम पढ़ा और जाना है

महात्मा गांधी की 150 वीं और शास्त्री जी की 115 वीं पुण्यतिथि पर मैं श्रद्धापूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं ।

इन दोनों लोगों की इतनी महान शख्सियत है कि मेरे जैसे अबोध के लिए कुछ लिख पाना समंदर में पानी डालने के समान होगा । ऐसा मैं इसलिए कह रहा की जिस गांधी जी व्यक्तित्व ,सोच व उनके विचारों के बारे में ईसा मसीह के बाद सबसे अधिक किताबें लिखी गई हो ऐसे महात्मा को समझने के लिए एक दो पुस्तक पढ़ लेना मेरे लिए शून्य के समान है ।

आज जब विश्व के 100 से अधिक देश गांधी जी की जयंती मना रही है । 77 से अधिक देशों में गांधी जी की मूर्तियां लगी हुई हैं , और 40 से अधिक देश बापू पर डाक टिकट जारी कर रहे हैं । उनके व्यक्तित्व के बारे में मेरे जैसों को लिखना गुस्ताखी करने के समान होगा ।

लेकिन फिर भी मैं ये हिमाकत इसलिए कर पा रहा हूं क्योंकि उन्हीं के देश हिंदुस्तान ने उनको सबसे कम पढ़ा ,जाना और समझा और जो धारणा बनाई वह किसी फैंसी फ़ेसबुकिया या सोशल मीडिया के जरिये ।

firstline

जितना मैंने गांधी को अभी तक पढ़ा और समझा है की गांधी जी मानव सेवा को ही सच्ची पूजा मानते थे । वह स्त्री को शक्ति स्वरूपा मानते थे इसलिए उन्होंने पुरुषों के साथ स्त्रियों को भी स्वतंत्रता संघर्ष की ओर उन्मुख किया ।

#रामधारी_सिंह’ दिनकर ‘ लिखते है कि एक बार बापू ने कहा था सत्य मेरा परमेश्वर है उसकी खोज में अहिंसा के द्वारा करता हूं । स्वदेशी और संसार की स्वतंत्रता के लिए किये जाने वाले मेरे प्रयास उसी साधना के अंग है।।

गांधी जी मानव, देश ,समाज की सेवा को अपना धर्म और अध्यात्म मानते थे। उन्होंने देश को आत्मा से लेकर शौचालय साफ रखने तक का संदेश दिया ।

गांधी जी चाहते थे उनकी वर्षगांठ मनाने के बजाय चरखा द्वादशी मनाई जाए ।

गांधी जी की जो सबसे बड़ी बात जो मुझे प्रभावित करती है कि सत्य और अहिंसा का प्रयोग पहले स्वयं पर करते हैं और फिर बाद में दूसरों को करने के लिए कहते हैं।

“विनोबा_भावे ” लिखते है कि बाबू देश की स्वतंत्रता और आध्यात्मिक विकास दोनों को साथ  साथ साधते थे । वे सत्य, अहिंसा ,ब्रह्मचर्य ,अस्तेय, अपरिग्रह, शारीरिक श्रम को न सिर्फ आध्यात्मिक विकास बल्कि देश सेवा का भी प्रमुख अंग मानते थे ।।

मैं गांधी को एक नेता नही बल्कि एक आध्यात्मिक नेता मानता हूँ जिसमे मुझे एक सूफी फकीर या संत नजर आता है वे गेरुआ वस्त्र धारण करने वाले साधु नहीं थे । लेकिन उनका जो साधुत्व या संन्यास था वह सबको लेकर चलना था ।

मैं खुद कई जगहों पर गांधी जी से असहमत हो सकता हूँ और ये भी चीज़ मैंने बापू से ही सीखा है वो किसी चीज़ को थोपते नही थे ।

बापू के पास अहिंसा, सत्याग्रह, स्वराज व अवज्ञा नाम का हथियार था इन्हीं हथियारों के जरिए उन्होंने ना केवल अपने व्यक्तित्व को बल्कि हिंदुस्तान को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाई ।

उनके शांति के उपदेश ने पूरे विश्व को समाहित कर लिया और शायद इन्ही सिद्धान्तों ने दुनिया के लाखों लोगों को प्रेरित किया जिनमे शांति के नोबेल पुरस्कार विजेता व कई विश्व के नेताओं ने गांधी जी के विचारों से प्रभावित होने की बात स्वीकारी उसमें अमेरिका के #मार्टिनलूथरकिंग ,तिब्बत के #दलाईलामा , म्यांमार के #आंगसानसूकी , दक्षिण अफ्रीका के #नेल्सनमंडेला ,भारत के #चाचानेहरू और मौजूदा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति #बराक_ओबामा इस सत्य को स्वीकार करते हैं कि वह गांधी के विचारों एवं दर्शन से प्रभावित हैं और भारत मे गांधी के  लाखो अनुयाई मिल जायेंगे ।

अपने इन्ही हथियारो के जरिये गांधी न केवल भारत मे बल्कि पूरे विश्व मे व्यवहारिक और प्रासंगिक बने हुए है ।

इस सत्य की खोज में कस्तूरबा ने उनका पूरा साथ दिया ।150वीं जयंती पर हमे गांधी और कस्तूरबा दोनों को याद करना चाहिए ।

लेखक : शुभम मिश्रा लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र हैं। यह लेखक के अपने निजी विचार हैं।