कोविड-19 के दृष्टिगत कॉमर्शियल शिशु आहार को न दें बढ़ावा

मुख्य बातें

  • सभी पोषण संस्थाओं को निर्देश, न बांटे पैकेट वाला शिशु आहार
  • आईएमएस एक्ट का सख़्ती से हो पालन

झाँसी : देश में कोविड-19 के इस मुश्किल दौर में शिशु स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहते हुए मदद कर रहीं सभी पोषण संस्थाओं और संगठनों को निर्देश दिये गए हैं, कि वह किसी भी प्रकार का पैक्ड शिशु आहार न बाँटें।

जिला कार्यक्रम अधिकारी नरेंद्र सिंह का कहना है कि इस दौरान धात्री महिलाओं एवं नवजात शिशुओं एवं बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण स्तर पर विशेष ध्यान दिया जाना जरूरी है।

यह सर्वविदित है कि जन्म के एक घंटे के अंदर स्तनपान, 6 माह तक सिर्फ स्तनपान तथा 6 माह पूर्ण होने पर माँ के दूध के साथ उपरी आहार व 2 साल तक स्तनपान शिशु का सर्वोत्तम आहार है।

लेकिन यह समय ऐसा है कि परिवार और माताएँ तनाव की स्थिति से गुजर रही हैं । तनाव के कारण दूध बनने की प्रक्रिया पर असर पड़ता है तथा कई बार दूध का बहाव कमजोर हो सकता है।

ऐसे में माता/पिता आसान विकल्प की खोज में रहते हैं, जिससे पैक्ड आहार को बढ़ावा मिलने की संभावना है |

इसी के क्रम में मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश शासन एवं प्रमुख सचिव बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग, उत्तर प्रदेश द्वारा यह अपेक्षा की गयी है कि भारत सरकार द्वारा पूरे देश में लागू आईएमएस एक्ट, 2003 यानि शिशु दुग्धाहार विकल्प, दुग्धपान बोतल एवं शिशु आहार अधिनियम, 1992 जिसे 2003 में संशोधित किया गया था का सख्ती से पालन किया जाए।

जिला कार्यक्रम अधिकारी का मानना है कि यही वह समय है जब हमें अधिक प्रयास कर स्तनपान व ऊपरी आहार व्यवहार की निरंतरता को सुनिश्चित करना है।

क्योंकि कृत्रिम दूध व ऊपरी आहार के डिब्बे विकल्प के रूप में कई बार गलत तरीके से प्रोत्साहित किए जाते है। जो बच्चों और माता के लिए हानिकारक होते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा सलाह दी गयी है कि यदि कोविड के दौरान माँ स्तनपान कराने में सक्षम नहीं है तो दूध कटोरी में निकालकर चम्मच से पिला सकते है।

यदि माँ इतनी ज्यादा बीमार है कि दूध निकालकर भी नहीं दे सकती, तो स्तनपान कराने के लिए एक दूसरी महिला से सहयोग ले सकती है।

प्रत्येक दशा में मुंह पर मास्क लगाते हुये तथा हाथों को साफ रखना है। प्रायः यह देखा गया है कि महामारी के दौरान कृत्रिम दूध बनाने वाली कंपनियाँ जनपद स्तर पर शिशुओं तथा परिवारों को डिब्बा बंद दूध/कृत्रिम दूध पाउडर की बिक्री बढ़ाने का प्रयास करते हैं।

कॉमर्शियल शिशु आहार स्तनपान तथा ऊपरी आहार का स्थान ले लेता है और बच्चों को कुपोषण के चक्र में डाल देता है।

यूनिसेफ़ का मानना है कि डिब्बा बंद दूध के प्रयोग से परिवार धीरे-धीरे कृत्रिम दूध और आसानी से उपलब्ध विकल्पों का सहारा ले लेते हैं जिससे शिशु माँ के दूध से वंचित रह जाते है।

साथ में माँ के आत्मविश्वास में भी कमी आती है। कोविड जैसी महामारी के समय कॉमर्शियल बेबी फूड का परिवार केन्द्रित अथवा वृहद स्तर पर वितरण रोकने हेतु सरकार तथा सभी विकासशील संस्थाओं को आगे आना चाहिए।

क्या बैन है आईएमएस एक्ट के अंतर्गत

• गर्भवती तथा धात्री माताओं एवं उनके परिवारों को मुफ्त सैंपल, दूध की बोतल एवं कृत्रिम आहार देने पर प्रतिबंध

• दो वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए डिब्बा बंद दूध कृत्रिम शिशु आहार के प्रोत्साहन पर प्रतिबंध है।

• किसी भी प्रकार के माध्यम से कॉमर्शियल शिशु आहार को दूसरे विकल्प के रूप में प्रचारित करना वर्जित है।

• स्वास्थ्य एवं पोषण संस्थाओं को इस कंपनियों द्वारा किसी भी प्रकार का डोनेशन देने पर प्रतिबंध है।