हिंदी दिवस : ज्ञ से ज्ञानी बनाने वाली हिंदी आज दो वक्त की रोटी देने में असमर्थ है ।

हिंदी का दुर्भाग्य है कि वह सिर्फ कुछ दिनों के आयोजन तक सीमित होकर रह गयी है।

यथार्थ स्थिति यह है कि आज हिंदी के सहारे आप दो वक्त की रोटी देने लायक रोजगार भी नहीं पा सकते हैं ।

हिंदी की स्वीकार्यता का स्तर समझने के लिए यह काफी है कि अब हिंदी भाषा को आम जनमानस तक पहुंचाने के लिए किसी दिवस और आयोजन का सहारा लेना पड़ रहा है ।

हिंदी आज के समय में प्रचलित सभी भाषाओं में सबसे परिपूर्ण है । हिंदी भाषा के अक्षर, संयुक्त अक्षर और मात्रायें इसे अति विशिष्ट बनाते हैं । लेकिन आज भी हम हिंदी भाषा को वैश्विक भाषा बना पाने समर्थ नहीं हो सके हैं।

बड़े-बड़े आयोजनों के नाम पर होने वाले ढकोसले और लूट आज सामान्य सी बात है।

हिंदी दिवस के दिन उमड़ने वाला प्रेम रात आते-आते Good Night के साथ भुला दिया जाता है।

वास्तविकता यह है कि आज के वैश्विक दौर में हिन्दी भाषा रोजगार देने में असमर्थ हैं । आज आप अपने दफ्तर में किसी अंग्रेजी और हिंदी के जानकार चपरासी को रखना पसंद करेंगे या सिर्फ हिंदी की जानकारी रखने वाले को ?

भारत के सरकारी दफ्तरों में हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए नोटिस लगे मिल जाते हैं, लेकिन उनके कामकाज की भाषा में अंग्रेजी को ही महत्त्व दिया जाता है ।

बड़े बैंकों में हिंदी में किए गए पत्र व्यवहार को हेय दृष्टि से देखा जाता है ।भारत के शीर्ष हिंदी अख़बारों में हिंदी पत्रकारों के लिए अंग्रेजी ज्ञान होना एक अनिवार्य योग्यता है।

यदि आप अंग्रेजी का अनुवाद हिंदी में नहीं कर सकते तो आप वहां पर अपनी जगह नहीं बना सकते । हिंदी मीडिया में भी पत्रकारिता करने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है ।

पत्रकारिता व जन संचार के विश्वविद्यालयों में हिंदी की किताबें ढूंढने के लिए आपको अत्यधिक परिश्रम करना पड़ेगा और जो किताबें आपको मिलेंगी उनका कंटेंट सिर्फ काम चलाऊ ही होगा ।

मामला साफ है अगर आपको अच्छा कंटेंट चाहिए तो आपको अंग्रेजी में ही मिलेगा और उसके लिए आपका अंग्रेजी सीखना आवश्यक है ।

हिंदी दिवस पर बड़े-बड़े आयोजन करने वाले और भारत के शीर्ष साहित्यकारों के बच्चे आपको अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में ही पढ़ते हुए मिलेगें । शहर से लेकर गांव तक खुल रहे सभी नए स्कूल अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा दे रहे हैं । अच्छी फीस भी ले रहे हैं। गांव का किसान भी अपना बच्चा एक अच्छे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में ही पढ़ाना चाहता है।

वास्तविकता यह है कि सरकार और हिंदी साहित्यकार का हिंदी से कोई सरोकार नहीं, बस ये जनता के मन में हिंदी प्रेम जगाने के लिए ख़ूब भाषण देते हैं, हिंदी दिवस पर कुछ आयोजन करते हैं और उसके नाम पर सरकारी खजाने से मोटा पैसा लेते हैं ।

आज का सबसे जरूरी सवाल यह है कि क्या हिंदी हमें रोजगार दे सकती है

बिना रोजगार भूखे पेट हम कब तक हिंदी का झंडा उठा सकते हैं, उसे ढ़ो सकते हैं । धंधा, नौकरी व विज्ञापन से लेकर पत्रकारिता तक में अंग्रेजी में ही अच्छा भविष्य है इस वास्तविकता को नकारा नहीं जा सकता।

उदय बी यादव लेखक फ़र्स्ट लाइन दैनिक हिंदी समाचार पत्र और वेबसाइट के संपादक है।