February 28, 2021

न खुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम

मुम्‍बई में मेरे एक बहुत पुराने मित्र हैं। कभी कांग्रेस के बड़े नेता हुआ करते थे। महाराष्ट्र के गृहमंत्री रहे चुके हैं। उत्तर भारत के रहने वाले हैं। मोदी की पहली बार नई नई सरकार बनी थीं। उनकी पत्नी बेहद धार्मिक प्रकृति की हैं।

चर्चा होने लगीं तो कहने लगी ‘अब हमरे रामलला क मंदिर बन जाई। बेचारे टेंट में रहते हैं,अपने ही घर में।

इन लोगों को तरस नहीं आता।’ ये कहते वक्त उनकी आंखें डबडबा गई थीं। रहती मुम्बई में हैं और चिन्ता राम मंदिर की। उन्हें देखकर मैं थोड़ी देर के लिए द्रवित हो गया। उन्होंने घर में ही रामलला का एक छोटा सा मंदिर बना रखा है। वे पूजा करने चलीं गईं।

बात आई गई हो गई। लेकिन हिन्दुस्तान की एक आम गृहणी से जुड़ी ये छोटी-सी घटना दिमाग के किसी कोने में शायद अटक गई थी। कल फैसला आया तो आज सोचा उन्हें फोन करके बधाई दे दूं। फोन नेताजी ने उठाया। बोले- आज वो लखनऊ में हैं वर्ना आपकी उनसे बात जरूर कराता। बता रहे थे कल फैसला साढ़े दस बजे आना था।

वे बोलीं- ‘आप टीवी देखिए मैं पूजा करने जा रही हूं। फैसला मंदिर के बारे में आए तभी बताइगा।’ सुबह साढ़े ग्यारह बजे के करीब कोर्ट का रामलला पर फैसला आ गया तो मैंने उन्हें पूजागृह में बताया कि- ‘ल अब तोहार मंदिर बन जाई। रामलला के पक्ष में फैसला आ गया। ये सुन कर वे फूट फूट के रोने लगीं। नेताजी ने पूछा कि ‘अब क्यों रो रही हो भाई। फैसला तुम्हारे पक्ष में आया है।’ कहने लगीं- ‘ये खुशी के आंसू हैं।’

तो इस देश में अयोध्या सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं था। जम्मू से लेकर तमिलनाडु तक और इधर गुजरात से लेकर आसम तक, ये करोडों श्रद्धालुओं के दिल से जुड़ा भावनात्मक मुद्दा था। मैं समझ नहीं पाया कि मजहब को अपना सब कुछ समझने वाले मुसलमान ये मामूली-सी मनोवैज्ञानिक बात क्यों नहीं समझ पाए? देश में मस्जिदें तो बहुत हैं लेकिन जन्मस्‍थान एक ही है।

भले राम का जन्म ठीक बाबरी मस्जिद के तीन गुम्बदों की 0.30 एकड़ जमीन पर न हुआ हो लेकर सदियों पुराना एक विश्वास है कि श्रीराम वहीं जनमें। तब क्यों न ये जमीन हिन्दुओं को ही दे दी जाए। मेरे नजदीक ये मानने की कोई वजह नहीं कि देश के अधिसंख्य मुसलमान ऐसा ही नहीं सोचते होंगे।

लेकिन उनके सुन्नी वक्फ बोर्ड जैसे संगठन इस सामान्य-सी भावना पर एकमत होकर फैसला क्यों नहीं ले पाए। और अपनी ही नहीं पूरे कौम की फजीहत करा बैठे। क्या वे यह सोच रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट करोडों हिन्दुओं की भावनाओं को दरकिनार कर उस जमीन का मालिकाना हक उन्हें दे देगा। वह जमीन जिसके बारे में उनके पास पूरे दस्तावेज तक नहीं हैं।

सुन्नी वक्फ बोर्ड बाबर द्वारा मस्जिद बनाने यानी 1528 ई. के बाद 1857 ई तक का एक भी दस्तावेज नहीं दे पाया कि उस जमीन पर उनका कब्जा था और वे वहां नमाज पढ़ते थे। यानी इन 329 सालों के दौरान वह एक लावारिस पड़ी मस्जिद थी। ऐसी विरान पड़ी मस्जिद के लिए दिन रात साथ रहने वाले करोडों हिन्दू पडोसियों की भावनाओं का उन्हें जरा भी ख्याल नहीं आया।

राजनीति से ऊपर उठ कर सोंचे तो ये वाकई तकलीफदेय बात है। भारतीय मुसलमानों के साथ दिक्कत ये है कि उनका कोई एक नेता नहीं। उनका कोई एक संगठन नहीं। उनका कोई एक स्कूल नहीं। सुन्नी वक्फ बोर्ड, शिया वक्फ़ बोर्ड को फूटी आंख नहीं सुहाता। बरेलवी स्कूल को देबबंद को नहीं देखना चाहता। ये दोनों अहमदियों को नहीं देखना चाहते। मुसलमानों का कोई लीडर इतना मुखर नहीं कि खुल कर अपनी राय रख सकें।

एक तरफ ओबैसी जैसे सियासतदान हैं जिन्हें हैदराबाद के बाहर कोई विश्वसनीय नहीं मानता। दूसरी तरफ आरिफ मुहम्मद खान जैसे मुसलमानों का भला चाहने वाले नेता हैं जिन्हें तमाम कट्टर मुसलमान अपनी कौम का दुश्‍मन समझते हैं। ऐसे में देश के मुसलमान चाह कर भी इक्ट्ठा होकर सड़क पर नहीं उतर सकते और नहीं कह सकते कि जो हुआ सो हुआ अब बाबरी मस्जिद की जमीन हिन्दुओं को दे दो। ऐसा कह कर वे न केवल ‌हिन्दुओं का भरोसा जीतते बल्कि हमेशा के लिए उनका मान बढ़ जाता।

तस्ववुर कीजिए अयोध्या की 0.30 एकड़ विवादित जमीन अगर समझौते में मुस्लिम पक्ष खुद ही छोड़ देता तो हिन्दुस्तान के मुसलमानों का सर सारी दुनिया के सामने फक्र से कैसे ऊंचा हो जाता। और मस्जिद तोड़ने वाले नामुराद लोग कितने शर्मसार होते। ये सलाह मैंने एक बार पहले दी थी तो मेरे मुसलमान दोस्त मुझसे नाराज हो गए और उनकी नजरों में मैं कम्युनल और संघी हो गया।

एक साहब तो कहने लगे-इस देश के हिन्दू ही बड़ा भाई बनकर हमें वह जमीन क्यों नहीं दे देते। मैंने उनसे कहा कि -खुदा भी आपकी मदद नहीं कर सकता।

ये हो गई मुसलमानों की बात। अब हिन्दुओं पर आइए।

हिन्दू बहुसंख्यक हैं इसलिए उनका रोना ये है कि हमारा देश, हम अकसरियत में और हमी पर ये जुल्मो सितम। कांग्रेस की सात दशकों की तुष्टीकरण या कहें वोटों की सियासत ने अधिकांश हिन्दुओं को बहुत निराश किया। उन्हें भड़काने की रही सही कसर कम्युनिस्टों और तथा कथित हिंदू सेकुलर बुद्धिजीवियों ने पूरी कर दी।

चाहे जेएनयू में भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह का गैंग हो या तीन तलाक का मसला। जन्मभूमि का मुद्दा हो या कश्मीर में धारा 370 हटाने का। मोदी-1 में इन्होंने इतना जहर बो दिया कि हिन्दू वोटर एकजुट हो गया। और मोदी सरकार बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में आ गई। और तब न केवल भारत के मुसलमानों बल्कि सारी दुनिया को लगने लगा कि मोदी के नेतृत्व में भारत हिन्दू राष्ट्र की तरफ बढ़ रहा है। भारत जैसे देश के लिए ये विचार ही बेहद खतरनाक है।

ठीक यही जर्मनी में हुआ था जब राष्ट्रवाद के खिलाफ कम्युनिस्टों ने जनता में इतना जहर बो दिया हिटलर की नाजी पार्टी का जनम हुआ। और देखते ही देखते हिटलर राष्ट्रनायक बन गया। मैं यहां हिटलर की तुलना मोदी से नहीं कर रहा। मोदी एक लोकतांत्रिक किस्म के तानाशाह हैं। खैर उन पर कभी बाद में। तो मैं कह रहा था राम मंदिर को इतना बड़ा मुद्दा बाबरी एक्‍शन कमेटी जैसी तंजीमों ने बनाया।

और उसके बाद बाबरी मस्जिद एक्‍शन कमेटी और सुन्नी वक्फ जैसे इदारों ने इसे हवा दी। ये एक बहुत बड़ी नासमझी थी जिसने पहली बार सारे देश के हिन्दुओं को एकजुट कर दिया। इस आंदोलन से भाजपा का जन्म हुआ। वे दो सीटों से बढ़कर 303 सीटों पर पहुंच गई और आज देश की लोकसभा और राज्यसभा उसके कब्जे में है।

आज राजनीतिक ताकत के रूप में भाजपा नेहरू के जमाने में 60 के दशक की कांग्रेस से भी ज्यादा मजबूत है।

मुझे याद आता है कि हमारे लखनऊ के मुस्लिम धर्मगुरू अली मियां ने अस्सी के दशक में ही इस खतरे को भाप लिया था। अली मियां वाहिद ऐसे धर्मगुरू थे जिनकी सभी फिरके के मुसलमान इज्जत करते थे।

मुझे याद है बाबरी मस्जिद का मुद्दा जब पूरे उफान पर था और मस्जिद तब टूटी नहीं थी। तब उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘कारवां ए जिन्दगी’ में लिखा था- ‘मैंने खुली आंख से ये देख रहा हूं बाबरी मस्जिद आंदोलन जिस तरह से चलाया गया उसने बहुसंख्यकों के दिलों में हिन्दू जागृति का जोश पैदा कर दिया है।

जो बड़े से बड़े हिन्दू पेशवा और प्रचारक पैदा नहीं कर पाए थे। इस्लामी लिहाज से ये नासमझी और अंधापन ही नहीं मुसलमानों के लिए ये खुदकुशी की तरह है। आपकी करतूतों से पडोसी समुदाय में अपने धार्मिक जागरण का खानदानी और दुश्मनी से भरा जोश पैदा हो जाए जो किसी मस्जिद या मरदसे और इस्लामी जीवन शैली के खिलाफ हो। इनकी ना-अक्ली और ना-समझी इस समस्या का समाधान नहीं होने देगी।’

और देखिए यही हुआ। समस्या का समाधान तो हो गया लेकिन मुस्लिम समुदाय के हाथ कुछ नहीं आया। एक फारसी कहावत है रोजा छुड़ाने गए और नमाज गले पड़ गई। बाबरी मस्जिद मामले में भी ठीक यही हुआ। उर्दू का ही एक शेर है- न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम न इधर के हुए न उधर के हुए। जाती तौर पर मुझे इस बात की बहुत तकलीफ है।

इसीलिए मैंने कल कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष के साथ इंसाफ नहीं किया। अगर बाबरी मस्जिद रहती तो सुप्रीम कोर्ट यह फैसला नहीं दे सकता था। खैर जो हुआ सो हुआ। अब असल इंसाफ तब होगा जब अदालत बाबरी मस्जिद गिराने वालों पर मुकदमा चला कर 40 दिन में फैसला दे। मैं जानता हूं ये नहीं होगा। लेकिन ये होना चाहिए।

दया सागर
लेेखक- वरिष्ठ पत्रकार हैं।