संदीप यादव:पढ़िये गांव की रामलीला के लक्ष्मण से बॉलीवुड की बाटला हाउस तक का सफर

लखनऊ : रामलीला के डायरेक्टर साहब ने कहा कि अरे ये तो बहुत बढ़िया है बस अब लक्ष्मण का रोल यही करेगा । रामलीला का वो छोटा सा लक्ष्मण अब फिल्मी दुनिया का जाना पहचाना नाम बन चुका है। हम बात कर रहे है मशहूर फिल्म बाटला हाउस, और धारावाहिक भाभी जी घर पर हैं के मशहूर अभिनेता संदीप यादव की।

रामलीला के लक्ष्मण से लेकर भाभी जी घर पर हैं और बाटला हाउस तक का सफर इतना आसान भी नहीं था। यादव वंश के एक बेहद साधारण से परिवार के किसी लड़के के लिए उस समय फिल्मी ख्वाब पालना नदी की धारा में विपरीत दिशा में चलने के समान था।

लेकिन जब हम किसी सपने को अपनी मंजिल मान लेते हैं और फिर उसके लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हो जाते है तो रास्ते अपने आप निकलते हैं। एक अदृश्य शक्ति हमेशा आपकी मदद को तैयार रहती है।

संदीप यादव बताते हैं कि मेरा जन्म लखनऊ के पास स्थित एक ठेठ गाँव में हुआ था ,माताजी मेरी शहर की महिला और पिता जी गाँव के आदमी थे लेकिन वो सरकारी नौकरी में थे इसलिए शादी शहर से हो गयी। भौतिक सुविधाओं में पली बढ़ी हमारी माताजी के लिए डालीगंज से कुँवर बहादुर खेड़ा गाँव में तालमेल बिठाना बेहद कठिन था । लेकिन मेरी माँ ने बहुत जल्दी ही गाँव की परिस्थितियों से भी तालमेल बना लिया।

मेरी आरंभिक पढ़ाई शहीदपथ के पास और तब लखनऊ से थोड़ी दूर स्थित गाँव की मिट्टी में हुयी। 5 वीं कक्षा तक सुबह बस्ता लेकर, टाट वाली बोरी बगल में दबाकर मैं पैदल सुबह जल्दी ही स्कूल पहुँच जाता था । स्कूल पहुँचते ही झाडू लगाना फिर उसके बाद पढ़ाई करना और छुट्टी होते ही अपनी बोरी समेट कर अपने गाँव पहुँच जाना यह मेरी प्रतिदिन कि दिनचर्या थी ।

मेरा स्कूल गाँव से 3-4 किमी दूर था, जो कि सुबह जाते वक्त अनंत दूरी का मालूम पड़ता था। सुबह की अनवरत भागदौड़ शाम को आवारा बच्चों की तरह गाय चराने और फिर सूरज ढ़लते वक्त चारा पानी करने के साथ ही खत्म होती थी।

संदीप कुछ मायूसी और मुस्कुराहट के साथ बताते हैं की उस समय के मास्टर जी की बेरहम मरमीट भी मुझे स्कूली पढ़ाई में बेहतर नहीं बना पायी। पिता जी के नैनीताल ट्रान्सफर होने के साथ मैं भी नैनीताल की खूबसूरत वादियों मे पहुँच गया।

गाँव का अवधी में बात करने वाला मैं शहर में भी अवधी में ही बात करता था तो लोग मुझ पर हँसते थे लेकिन उस हंसी ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया । नैनीताल में सीखी शुद्ध हिन्दी नें मुझे उस समय गाँव में अँग्रेजी के प्रकांड विद्वान की उपाधि प्रदान कर दी थी। जो मेरे जैसे बुद्धू बच्चे के लिए बड़ी सफलता थी।

नैनीताल में स्थित पिताजी के ऑफिस की सरकारी कालोनी में एक रामलीला कमेटी थी पिताजी कमेटी के मेम्बर थे तो शाम को रिहर्शल पर जाते थे । एक दिन अचानक लक्ष्मण का रोल कर रहे लड़के की तबीयत खराब हो गयी।

वह दो दिन नहीं आया, तीसरे दिन रामलीला के डायरेक्टर साहब नें मेरे ऊपर नजर ठहराते हुये कहा अरे बेटा जरा तुम पढ़ो, पहले तो मैं सहम गया लेकिन फिर जब देखा कि उसमें रामचरित मानस की चौपाइयाँ और दोहे थे जिससे मेरा मनोबल बढ़ गया।

हम लोग बचपन से गाँव में रामचरित मानस पढ़ चुके थे तो फिर दना दन पूरी ऊंची आवाज़ में सभी दोहे पढ़ डाले। रामलीला के डायरेक्टर साहब ने कहा बहुत बढ़िया, बस हमारा लक्ष्मण मिल गया। रामलीला में पहली बार अभिनय के लिये मिले बेस्ट एक्टर के अवार्ड नें उन्हे कुँवर बहादुर खेड़ा से मायानगरी मुंबई तक पहुंचा दिया।

चकाचौंध भरी मायानगरी में अपने लिये जगह बना पाना इतना आसान भी नहीं था, और यहीं से शुरू होता है सोने से लेकर 2 वक्त की रोटी पाने का संघर्ष जो उन्हे रामलीला के लक्ष्मण से बालीवुड की फिल्म बाटला हाउस के नेता तक ले आया।

अगली कड़ी में – पढ़ें मुंबई के गुमनाम संदीप से भाभी जी घर पर हैं के चर्चित संदीप बनने की यात्रा
क्रमशः
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Sandeep Yadav https://twitter.com/sandyart22?s=08